ना जाने क्यों जब भी ये गाना सुनता हूँ तो ये कहीं न कहीं से दिल के तारों को छेड़ जाता है। आज शायद कुछ बीती बातें याद कर रहा था और सहसा इस गाने के बोल सुनाई दिए। काफ़ी देर तक सोचता रहा गाने के बोलों की सच्चाई को।
कितने अजीब रिश्ते हैं यहाँ पे...
दो पल मिलते हैं, साथ साथ चलते हैं
जब मोड़ आए तो बचके निकलते हैं
कितने अजीब रिश्ते हैं यहाँ पे...
यहाँ सभी अपने ही धुन में दीवाने हैं
करे वोही जो अपना दिल ठीक माने हैं
कौन किसको पूछें, कौन किसको बोले
सबके लबों पर अपने तराने हैं
ले जाए नसीब किसको कहाँ पे
कितने अजीब रिश्ते हैं यहाँ पे...
ख्वाबों की ये दुनिया है, ख्वाबों में ही रहना है
राहें ले जाए जहाँ, संग संग चलना है
वक्त ने हमेशा यहाँ नए खेल खेले
कुछ भी हो जाए यहाँ, बस खुश रहना है
मंजिल लगे करीब सबको यहाँ पे
कितने अजीब रिश्ते हैं यहाँ पे...
आज के युग में कितना सटीक लगते हैं इस गाने के बोल। आज की दुनिया की ये ही सच्चाई है। आज तक ना जाने कितने लोगों को दोस्त बनाया/समझा। कुछ तो अपना मतलब सिद्ध करके चलते हुए और कुछ ने बिना किसी कारण के मुँह फेर लिया। ज़िंदगी तो अपनी रफ़्तार से चलती ही रहेगी परन्तु उन मोड़ों कि यादें और कसक हमेशा इस दिल में रह जायेगी जिस मोड़ से वो बच के निकले थे।
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Thursday, February 14, 2008
Sunday, February 10, 2008
परिवार कि सुख
तनु निम्न मध्यम परिवार में पली बढ़ी और पढ़ने लिखने में उतीर्ण कन्या है। उसके पापा और चाचा एक साथ कपडे की दुकान करते हैं और माँ और चाची घर संभालती हैं। तनेश उसका २ साल छोटा चचेरा भाई है। तनेश भी पढ़ने लिखने में होशियार है। तनु के डाक्टरी में चयन हो जाने के कारण आज घर में छोटी सी पार्टी है और सब बहुत खुश हैं, विशेषकर उसकी चाची क्योंकि तनु की चाची तनु की बहुत अच्छी दोस्त भी है।
तनु अपनी पढाई के लिए जा रही है और सब स्टेशन पर उसे छोड़ने जाते हैं। परन्तु उसकी चाची नहीं जा रही क्योंकि वो तनु को जाते हुए नहीं देख सकती। तनु पढ़ने चली गयी और कुछ दिन बाद घर में सब कुछ पहले जैसा चलने लगा पर अभी भी तनु की कमी सबको महसूस होती है।
वक़्त बीता और तनेश का भी इंजीनियरिंग में चयन हो गया। परन्तु घर की आर्थिक स्थिथि को देखते हुए और तनु की पढाई में लगने वाले खर्चे को देखते हुए तनु के चाचा ने तनेश को आगे पढ़ने से मना कर दिया और दुकान में उनका हाथ बटाने को बोला, परन्तु तनेश अभी और पढना चाहता है। तनु की माँ को तनु के चाचा की बात पसंद नहीं आई और उन्होने तनु की पढाई को रोक कर तनेश के पढाई को शुरू करने की बात कही। तनु की चाची ने तनु के चाचा का पक्ष लिया और बोला दुकान पर २ की जगह अगर ३ लोग होने तो ज्यादा अच्छे से काम होगा इसलिए तनेश का दुकान पर काम करना ही ठीक है। बहुत कहने सुनने के बाद ये निर्णय हुआ की तनेश दुकान पर काम करेगा और उसकी पढाई रोक दी गयी क्योंकि तनु की चाची ने धमकी दे दी थी की अगर तनु की पढाई रोकी गयी तो वो घर से चली जाएगी।
इस सब बातों से बेखबर तनु ने डाक्टरी में हर साल अव्वल स्थान प्राप्त किया और २.५ साल के बाद वो घर आ रही है। सब उसे स्टेशन लेने गए और तनु अपने चाची को स्टेशन पर देख कर बहुत खुश हुई। २.५ साल बाद घर आने पर वो फूली नहीं समा रही थी परन्तु तनु की माँ ज्यादा खुश नहीं थी क्योंकि उसे पता था की जब तनु को तनेश की पढाई के बाए में पता लगेगा तो बहुत नाराज होगी। और ऐसा ही हुआ, जब तनु ने सुना की आर्थिक तंगी के कारण तनेश की पढाई रोक दी गयी है तो रो रो कर उसका बुरा हाल हो गया। तनु ने तुरंत अपनी पढाई छोड़ने का सोचा और अपनी चाची से बोली कि अब वो आगे नहीं पढना चाहती है। परन्तु उसकी चाची ने फिर घर से चले जाने कि बात कही। तनु समझ नहीं पा रही थी की वो अपनी चाची को क्या कहे। अपनी चाची से चिपट कर तनु रोती रही और रोते रोते सोचती रही कि ना जाने किन अच्छे कर्मो के कारण उसको ऐसी चाची मिली और ऐसा परिवार मिला जहाँ सब एक दुसरे कि ख़ुशी के लिए अपनी ख़ुशी छोड़ने पर तनिक भी विचार नहीं करते। शायद आज तनु के दिल कि हालत उससे बेहतर कोई नहीं समझ सकता था।
तनु अपनी पढाई के लिए जा रही है और सब स्टेशन पर उसे छोड़ने जाते हैं। परन्तु उसकी चाची नहीं जा रही क्योंकि वो तनु को जाते हुए नहीं देख सकती। तनु पढ़ने चली गयी और कुछ दिन बाद घर में सब कुछ पहले जैसा चलने लगा पर अभी भी तनु की कमी सबको महसूस होती है।
वक़्त बीता और तनेश का भी इंजीनियरिंग में चयन हो गया। परन्तु घर की आर्थिक स्थिथि को देखते हुए और तनु की पढाई में लगने वाले खर्चे को देखते हुए तनु के चाचा ने तनेश को आगे पढ़ने से मना कर दिया और दुकान में उनका हाथ बटाने को बोला, परन्तु तनेश अभी और पढना चाहता है। तनु की माँ को तनु के चाचा की बात पसंद नहीं आई और उन्होने तनु की पढाई को रोक कर तनेश के पढाई को शुरू करने की बात कही। तनु की चाची ने तनु के चाचा का पक्ष लिया और बोला दुकान पर २ की जगह अगर ३ लोग होने तो ज्यादा अच्छे से काम होगा इसलिए तनेश का दुकान पर काम करना ही ठीक है। बहुत कहने सुनने के बाद ये निर्णय हुआ की तनेश दुकान पर काम करेगा और उसकी पढाई रोक दी गयी क्योंकि तनु की चाची ने धमकी दे दी थी की अगर तनु की पढाई रोकी गयी तो वो घर से चली जाएगी।
इस सब बातों से बेखबर तनु ने डाक्टरी में हर साल अव्वल स्थान प्राप्त किया और २.५ साल के बाद वो घर आ रही है। सब उसे स्टेशन लेने गए और तनु अपने चाची को स्टेशन पर देख कर बहुत खुश हुई। २.५ साल बाद घर आने पर वो फूली नहीं समा रही थी परन्तु तनु की माँ ज्यादा खुश नहीं थी क्योंकि उसे पता था की जब तनु को तनेश की पढाई के बाए में पता लगेगा तो बहुत नाराज होगी। और ऐसा ही हुआ, जब तनु ने सुना की आर्थिक तंगी के कारण तनेश की पढाई रोक दी गयी है तो रो रो कर उसका बुरा हाल हो गया। तनु ने तुरंत अपनी पढाई छोड़ने का सोचा और अपनी चाची से बोली कि अब वो आगे नहीं पढना चाहती है। परन्तु उसकी चाची ने फिर घर से चले जाने कि बात कही। तनु समझ नहीं पा रही थी की वो अपनी चाची को क्या कहे। अपनी चाची से चिपट कर तनु रोती रही और रोते रोते सोचती रही कि ना जाने किन अच्छे कर्मो के कारण उसको ऐसी चाची मिली और ऐसा परिवार मिला जहाँ सब एक दुसरे कि ख़ुशी के लिए अपनी ख़ुशी छोड़ने पर तनिक भी विचार नहीं करते। शायद आज तनु के दिल कि हालत उससे बेहतर कोई नहीं समझ सकता था।
Wednesday, January 23, 2008
यादें .......
जब कभी गुजरा जमाना याद आता है,
बना मिटटी का अपना घर पुराना याद आता है।
वो पापा से चवन्नी रोज मिलती जेब खरचे को,
वो अम्मा से मिला एक आध-आना याद आता है।
वो छोटे भाई का लडना,वो जीजी से मिली झिङकी,
शाम को फिर भूल जाना याद आता है।
वो घर के सामने की अधखुली खिङकी अभी भी है,
वहाँ पर छिप कर किसी का मुस्कुराना याद आता है।
वो उसका रोज मिलना,न मिलना फिर कभी कहना
जरा सी बात पर हँसना हँसाना याद आता है।
बना मिटटी का अपना घर पुराना याद आता है।
वो पापा से चवन्नी रोज मिलती जेब खरचे को,
वो अम्मा से मिला एक आध-आना याद आता है।
वो छोटे भाई का लडना,वो जीजी से मिली झिङकी,
शाम को फिर भूल जाना याद आता है।
वो घर के सामने की अधखुली खिङकी अभी भी है,
वहाँ पर छिप कर किसी का मुस्कुराना याद आता है।
वो उसका रोज मिलना,न मिलना फिर कभी कहना
जरा सी बात पर हँसना हँसाना याद आता है।
Friday, July 20, 2007
माँ का चूल्हा
"बेटा खाना तैयार है, आकर खा लो। "
"माँ आज भूख नहीं है, मैं खाना नहीं खाऊंगा।"
"नहीं बेटा रात को बिना खाना खाए नहीं सोते हैं। रात में बुढिया आकर पेट छू कर देखेगी और अगर तुम बिना खाना खाए सो जाओगे तो तुम्हारा सारा खाना खा जाएगी और सपने में डराएगी। इस लिए थोडा ही सही, पर खा लो।"
माँ के लाख आग्रह करने के बाद भी विजय ने खाना नहीं खाया। माँ और क्या करती, वो थोडा बहुत खाना खा कर सो गयी। विजय बहुत खुश था की आज माँ की बात नहीं मानी और खाना नहीं खाया और अपनी बात माँ से मनवा ली। पर माँ की व्यथा माँ ही जानती है जब उसके बेटे को भूखा सोना पड़ता है (वो क्यों ना उसकी जिद्द ही हो)। बेटा भूखा हो और माँ को नींद आ जाए ऐसा कैसे हो सकता है। माँ का मन नहीं माना और वो फिर विजय के पास आकर बोलती है "बेटे कितने प्यार से मैंने तुम्हारे लिए खाना बनाया है, थोडा सा खा ले मेरे बेटे।" माँ फिर समझाती है "बेटे एक दिन ऐसा आएगा जब तुम कहीँ बाहर चले जाओगे तब तुम्हारी समझ में आएगा की मैं तुमसे खाना खाने के लिए बार बार क्यों बोलती हूँ।" "ये क्या रोज रोज रोटी बना देती हो माँ, मैं नहीं खाऊंगा।" विजय तो खुश था की उसकी जिद्द पूरी हो गयी और उसे माँ की रोटी नहीं खानी पडी। पर विजय बार बार ये ही सोचता रह की माँ ऐसा क्यों बोल रही है? क्या बाहर चले जाने पर मुझे खाना नहीं मिलेगा या माँ ये समझती है की मैं खुद से खाना बना नहीं सकता। विजय ने आख़िर माँ की बात नहीं मानी और ऐसे ही सो गया।
वक़्त ने करवट बदली और विजय को पढ़ाई के लिए बाहर जाना पड़ा। माँ ने डब्बे में पूरियां और सब्जी बाँध के दे दी और बोला "बेटे रास्ते में खा लेना, अगर कुछ बच जाए तो फेंकना नहीं, किसी गरीब को दे देना"।
विजय पढ़ाई के लिए पहली बार घर से बाहर निकला था तो उसके मन में बाहर रहने की थोड़ी ख़ुशी तो थी पर अपने अपनों से दूर रहने का दुःख भी हो रह था। विजय ने माँ का दिया हुआ खाना गाड़ी में खा लिया और बचा हुआ खाना ना जाने क्या सोच कर रख लिया।
कालेज का पहला दिन और विजय कालेज की मेस में खाना खाने पहुंच गया। खाना बहुत अच्छा बना हुआ था। बढिया पूरियां, दो तरह की सब्जी, खीर, मटर पुलाव। विजय बहुत खुश हुआ और खाना खाने ये सोच के बैठ गया की आज जम के खाऊंगा। पर ये क्या, विजय से तो एक पूरी भी नहीं खाई गयी। वो खाना खाते खाते बार बार कुछ सोचने लगता था।
शायद अब विजय की समझ में आ रहा था की माँ बार बार खाना खाने को क्यों बोलती थी। मेस में खाना तो बहुत अच्छा था पर माँ का प्यार जो खाने में मिला होता है उसका पूरी तरह से अभाव था। माँ के प्यार के बिना वो मेस का खाना विजय को जहर की तरह लग रहा था। तभी विजय को माँ के दिए हुए डब्बे के खाने की याद आयी और वो मेस का खाना छोड कर वो ही माँ के हाथों की बनी बांसी पूरियां और सब्जी खाने चला गया। खाना खाते खाते वो माँ की सारी बातों को याद करता रहा और आंखों से आंसू बहते रहे।
आज उसे एहसास हो रहा था की जब भी वो खाना फेंकता था तो माँ खाना फेंकने के लिए क्यों मन करती थी। उसे आज अपने आप पर बड़ी ख़ुशी हो रही थी की उसने माँ का वो खाना नहीं फेंका नहीं तो शायद उसे फिर से भूखा सोना पड़ता और आज भी माँ का मन दुःखी होता।
"माँ आज भूख नहीं है, मैं खाना नहीं खाऊंगा।"
"नहीं बेटा रात को बिना खाना खाए नहीं सोते हैं। रात में बुढिया आकर पेट छू कर देखेगी और अगर तुम बिना खाना खाए सो जाओगे तो तुम्हारा सारा खाना खा जाएगी और सपने में डराएगी। इस लिए थोडा ही सही, पर खा लो।"
माँ के लाख आग्रह करने के बाद भी विजय ने खाना नहीं खाया। माँ और क्या करती, वो थोडा बहुत खाना खा कर सो गयी। विजय बहुत खुश था की आज माँ की बात नहीं मानी और खाना नहीं खाया और अपनी बात माँ से मनवा ली। पर माँ की व्यथा माँ ही जानती है जब उसके बेटे को भूखा सोना पड़ता है (वो क्यों ना उसकी जिद्द ही हो)। बेटा भूखा हो और माँ को नींद आ जाए ऐसा कैसे हो सकता है। माँ का मन नहीं माना और वो फिर विजय के पास आकर बोलती है "बेटे कितने प्यार से मैंने तुम्हारे लिए खाना बनाया है, थोडा सा खा ले मेरे बेटे।" माँ फिर समझाती है "बेटे एक दिन ऐसा आएगा जब तुम कहीँ बाहर चले जाओगे तब तुम्हारी समझ में आएगा की मैं तुमसे खाना खाने के लिए बार बार क्यों बोलती हूँ।" "ये क्या रोज रोज रोटी बना देती हो माँ, मैं नहीं खाऊंगा।" विजय तो खुश था की उसकी जिद्द पूरी हो गयी और उसे माँ की रोटी नहीं खानी पडी। पर विजय बार बार ये ही सोचता रह की माँ ऐसा क्यों बोल रही है? क्या बाहर चले जाने पर मुझे खाना नहीं मिलेगा या माँ ये समझती है की मैं खुद से खाना बना नहीं सकता। विजय ने आख़िर माँ की बात नहीं मानी और ऐसे ही सो गया।
वक़्त ने करवट बदली और विजय को पढ़ाई के लिए बाहर जाना पड़ा। माँ ने डब्बे में पूरियां और सब्जी बाँध के दे दी और बोला "बेटे रास्ते में खा लेना, अगर कुछ बच जाए तो फेंकना नहीं, किसी गरीब को दे देना"।
विजय पढ़ाई के लिए पहली बार घर से बाहर निकला था तो उसके मन में बाहर रहने की थोड़ी ख़ुशी तो थी पर अपने अपनों से दूर रहने का दुःख भी हो रह था। विजय ने माँ का दिया हुआ खाना गाड़ी में खा लिया और बचा हुआ खाना ना जाने क्या सोच कर रख लिया।
कालेज का पहला दिन और विजय कालेज की मेस में खाना खाने पहुंच गया। खाना बहुत अच्छा बना हुआ था। बढिया पूरियां, दो तरह की सब्जी, खीर, मटर पुलाव। विजय बहुत खुश हुआ और खाना खाने ये सोच के बैठ गया की आज जम के खाऊंगा। पर ये क्या, विजय से तो एक पूरी भी नहीं खाई गयी। वो खाना खाते खाते बार बार कुछ सोचने लगता था।
शायद अब विजय की समझ में आ रहा था की माँ बार बार खाना खाने को क्यों बोलती थी। मेस में खाना तो बहुत अच्छा था पर माँ का प्यार जो खाने में मिला होता है उसका पूरी तरह से अभाव था। माँ के प्यार के बिना वो मेस का खाना विजय को जहर की तरह लग रहा था। तभी विजय को माँ के दिए हुए डब्बे के खाने की याद आयी और वो मेस का खाना छोड कर वो ही माँ के हाथों की बनी बांसी पूरियां और सब्जी खाने चला गया। खाना खाते खाते वो माँ की सारी बातों को याद करता रहा और आंखों से आंसू बहते रहे।
आज उसे एहसास हो रहा था की जब भी वो खाना फेंकता था तो माँ खाना फेंकने के लिए क्यों मन करती थी। उसे आज अपने आप पर बड़ी ख़ुशी हो रही थी की उसने माँ का वो खाना नहीं फेंका नहीं तो शायद उसे फिर से भूखा सोना पड़ता और आज भी माँ का मन दुःखी होता।
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