नवरात्रों के आते ही याद आती है कुछ २० साल पुरानी बातें जो जवानी से मुझे बचपन की तरफ़ खींच कर ले जाती हैं और दिखाती हैं वो दृश्य जब शाम को स्कूल से आने के बाद मोहल्ले के सारे लड़के अच्छे अच्छे कपड़े पहने हुए अपनी अपनी साइकिल ले कर मेरे घर के बड़े दरवाज़े के सामने इकठ्ठा हो जाते थे। मन में "माँ" के दर्शनों की लालसा और सबके दिल में मन्दिर जाते हुए साइकिल के रेस की चाह होती थी। मन्दिर जाते हुए माँ से प्रसाद चढाने के लिए २ रुपये मिला करते थे जिसमे से कभी कभी १.५० रुपये का प्रसाद चढा कर ५० पैसे बचा लिया करते थे और उन ५० पैसों की इमली/टॉफी/आइसक्रीम खाया करते थे।
मन्दिर की ओर जाते हुए (साइकिल की रेस लगाते हुए) दूर से ही भक्ति गीत सुनाई देते थे। नवरात्रों के समय मन्दिर में बड़ा लाउडस्पीकर लगा होता था और सुबह से ही भक्ति गीत बजने चालू हो जाते थे जो रात तक बजते रहते थे। ढेर सारी चमचमाती झालरों और बड़े बड़े फ्लश लाइटों से सारा मन्दिर जगमगाता रहता था। पास में ही एक तालाब था जिसमे सबसे पहले हाथ और पैर धोया करते थे और प्रसाद लेकर लम्बी सी कतार में खड़े हो जाते थे। कतार में खड़े होने के बाद गिनती शुरू होती थी की कितने आदमी हमारे आगे लगे हुए हैं। कभी कभी ये गिनती २०-२५ होती थी और कभी कभी (प्रायः अष्टमी के दिन) २००-२५० हुआ करती थी।
कतार में खड़े हुए सबके बीच साइकिल रेस वार्तालाप का गंभीर विषय रहता था की आज कौन जीता/अब तक कौन कितनी बार जीत चुका है/अब तक किसने सबसे तेज साइकिल चलाई। बात करते करते दर्शन का वक़्त आ जाता था और दर्शन करने के बाद सारे लोग थोड़ा प्रसाद खाते थे और थोड़ा घर पर बांटने के लिए बचा लेते थे।
नवरात्रों के समय मन्दिर में मेला लगा करता था जिसमे मनोरंजन के बहुत साधन होते थे जैसे बड़े बड़े झूले, अलग अलग करतब, गुब्बारे वाला, तोते से भविष्य बताने वाला, नाचने गाने वाले, बाइस्कोप से फोटो दिखाने वाला इत्यादी। खाने के लिए चाट, पूरी सब्जी, चना जोर गरम, समोसा, पकोडी और सबसे ज़्यादा बिक्री करने वाला होता था आइसक्रीम वाला।
दर्शन करने के बाद हम सभी लोग मेले में जाते थे और थोडी देर तक मौज मस्ती करते थे। बचे हुए ५० पैसों से कुछ खाते थे, कभी कभी झूला झूल लिया करते थे और कभी कभी गुब्बारे भी खरीद लिया करते थे।
माँ के शक्त निर्देश पर कि "शाम होने से पहले घर आ जाना" सभी लोग अँधेरा होने से पहले अपनी अपनी साइकिल ले कर और पुनः साइकिल कि रेस लगते हुए वापस घर को आ जाया करते थे।
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Tuesday, April 8, 2008
Thursday, July 12, 2007
सौभाग्य और दुर्भाग्य के बदलते रुप
बात दो दिन पुरानी है। दुर्भाग्यवश मेरा मोबाइल फ़ोन कहीँ खो गया था। जब मुझे एहसास हुआ कि मेरा मोबाइल मेरे पास नहीं है तो मेरा माथा ठनका और थोडा भी विलंब ना करते हुए और ये मनाते हुए कि किसी भले इन्सान ने मेरा मोबाइल लिया हो मैं अपने मोबाइल पे फ़ोन करने लगा। दो घंटे के अथक प्रयास के बाद उन सज्जन ने (जिन्होंने मेरा मोबाइल लिया था) मेरी कॉल ली और मेरे इस दुर्भाग्य पर अपना उल्लू सीधा करने कि सोची। महानुभाव ने मेरे मोबाइल को वापस करने के लिए मेरे सामने ५०$ का प्रस्ताव रखा। मेरा मोबाइल दो साल के अनुबंध में है जिसके पूरा ना होने पर मुझे १७५$ का दण्ड देना होगा। इस बात को विचार करते हुए मैंने उनको ५०$ देना स्वीकार कर लिया। पर मैं भी ठहरा बनिया ऐसे कैसे किसी को ५०$ दे दूं। कुछ भले लोगों कि सम्मति से मैंने पुलिस में रिपोर्ट कर दी।
अब बात बताता हूँ मोबाइल चोरी करने वाले सज्जन की बुद्धिमानी की। सज्जन को ये लगा कि मैं कोई डरपोक बालक होऊंगा और उनके पैसे मांगने पर मैं चुप चाप उनको पैसे दे के मोबाइल ले आऊंगा। ये सोचते हुए उन्होने मुझे अपने इलाक़े का पता और अपना नाम बडे प्रेम से बता दिया और बोला कि "४ बजे फिर से बात करना तब मैं वो जगह बताऊंगा जहाँ तुम्हे पैसे दे के मोबाइल लेना है।" ये सब सुन के मुझे इस बात का पूरा भरोसा हो गया कि ये सज्जन पहली बार मोबाइल कि फिरौती कि रकम माँग रहे हैं।
इस बीच मैंने पुलिस को ये बोल दिया कि मैं ४ बजे उससे मिलने का स्थान पूछ के बताता हूँ। अमेरिका कि पुलिस बड़ी कि सहायक होती है, इसलिये पुलिस ने मेरी बात मान ली और मुझ से ४ बजे मिलने को बोला।
पुनः ४ बजे मैंने उन महानुभाव को फ़ोन किया तो उन्होने मुझे एक जगह और वहाँ पहुँचने का रास्ता बता दिया। बस फिर क्या था, मैंने पुलिस वाले भाई साहब को अपने साथ लिया और पहुंच गया बताई हुई जगह पर। मैंने पुलिस वाले भाई साहब से बोला कि पहले मैं जाता हूँ और बात करता हूँ और थोड़ी देर बाद आप आ जाना।
जब मैं उन महानुभाव के पास पहुँचा और देखा कि वो अपने घर के बाहर ही खडे हैं तो मुझे उनकी इस बुद्धिमानी पे थोड़ी हंसी आयी परंतु जब मैंने ७ फ़ीट लम्बा ४० इंच चौड़ा आदमी देखा तो मेरे होश उड़ गए और सारी हंसी गायब हो गयी...... हिम्म्मत कर के मैं उनके पास पहुँचा और उन्होने सबसे पहले मुझ से फिरौती कि रकम कि माँग कि। मैंने बोला मुझ जैसे गरीब के पास ५०$ कहॉ से होंगे। पर वो अपनी बात से अडिग था। हमारे बीच वार्तालाप थोडा गरम हो ही रह था कि पुलिस वाले भाई साहब ने आकर स्थिती को संभाल लिया और उन महानुभाव को हथकड़ी लगा दी और मेरा मोबाइल मुझे वापस दिला दिया। बाद में पता चला कि उसे छोड दिया गया है और उनके ऊपर कुछ जुर्माना लगेगा। मैं बार बार ये ही सोचने पे विवश हो रह था कि वो मेरा दुर्भाग्य था कि मुझ से मोबाइल गिर गया था या उन महानुभाव का दुर्भाग्य था जो ५०$ का सपना देखते देखते कारागार जाते जाते बचे और जुर्माना दे बैठे...... जब मेरा दुर्भाग्य था (मोबाइल खोना) तब किसी का सौभाग्य था (५०$ मिलने की आशा) और जब मेरा दुर्भाग्य सौभाग्य में परिवर्तित हुआ (मोबाइल वापस मिला) तब उन्ही सज्जन का सौभाग्य दुर्भाग्य में परिवर्तित हो गया (जुर्माना देना पड़ा)।
दुर्भाग्य अथवा सौभाग्य किसी का भी हो ऊपर वाले कि अनुकम्पा से मुझे मेरा मोबाइल वापस मिल गया था और मेरे चहरे पर हंसी वापस आ गयी थी :-) ....
अब बात बताता हूँ मोबाइल चोरी करने वाले सज्जन की बुद्धिमानी की। सज्जन को ये लगा कि मैं कोई डरपोक बालक होऊंगा और उनके पैसे मांगने पर मैं चुप चाप उनको पैसे दे के मोबाइल ले आऊंगा। ये सोचते हुए उन्होने मुझे अपने इलाक़े का पता और अपना नाम बडे प्रेम से बता दिया और बोला कि "४ बजे फिर से बात करना तब मैं वो जगह बताऊंगा जहाँ तुम्हे पैसे दे के मोबाइल लेना है।" ये सब सुन के मुझे इस बात का पूरा भरोसा हो गया कि ये सज्जन पहली बार मोबाइल कि फिरौती कि रकम माँग रहे हैं।
इस बीच मैंने पुलिस को ये बोल दिया कि मैं ४ बजे उससे मिलने का स्थान पूछ के बताता हूँ। अमेरिका कि पुलिस बड़ी कि सहायक होती है, इसलिये पुलिस ने मेरी बात मान ली और मुझ से ४ बजे मिलने को बोला।
पुनः ४ बजे मैंने उन महानुभाव को फ़ोन किया तो उन्होने मुझे एक जगह और वहाँ पहुँचने का रास्ता बता दिया। बस फिर क्या था, मैंने पुलिस वाले भाई साहब को अपने साथ लिया और पहुंच गया बताई हुई जगह पर। मैंने पुलिस वाले भाई साहब से बोला कि पहले मैं जाता हूँ और बात करता हूँ और थोड़ी देर बाद आप आ जाना।
जब मैं उन महानुभाव के पास पहुँचा और देखा कि वो अपने घर के बाहर ही खडे हैं तो मुझे उनकी इस बुद्धिमानी पे थोड़ी हंसी आयी परंतु जब मैंने ७ फ़ीट लम्बा ४० इंच चौड़ा आदमी देखा तो मेरे होश उड़ गए और सारी हंसी गायब हो गयी...... हिम्म्मत कर के मैं उनके पास पहुँचा और उन्होने सबसे पहले मुझ से फिरौती कि रकम कि माँग कि। मैंने बोला मुझ जैसे गरीब के पास ५०$ कहॉ से होंगे। पर वो अपनी बात से अडिग था। हमारे बीच वार्तालाप थोडा गरम हो ही रह था कि पुलिस वाले भाई साहब ने आकर स्थिती को संभाल लिया और उन महानुभाव को हथकड़ी लगा दी और मेरा मोबाइल मुझे वापस दिला दिया। बाद में पता चला कि उसे छोड दिया गया है और उनके ऊपर कुछ जुर्माना लगेगा। मैं बार बार ये ही सोचने पे विवश हो रह था कि वो मेरा दुर्भाग्य था कि मुझ से मोबाइल गिर गया था या उन महानुभाव का दुर्भाग्य था जो ५०$ का सपना देखते देखते कारागार जाते जाते बचे और जुर्माना दे बैठे...... जब मेरा दुर्भाग्य था (मोबाइल खोना) तब किसी का सौभाग्य था (५०$ मिलने की आशा) और जब मेरा दुर्भाग्य सौभाग्य में परिवर्तित हुआ (मोबाइल वापस मिला) तब उन्ही सज्जन का सौभाग्य दुर्भाग्य में परिवर्तित हो गया (जुर्माना देना पड़ा)।
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