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Thursday, April 10, 2008

आई ऍम इन लव

प्रेम के विविध प्रकार होते हैं परन्तु आज मैंने जिस प्रकार के प्रेम को चर्चा का विषय चुना है वो है वो है एक प्रेमी और प्रेमिका के बीच विवाह के पहले का प्रेम। आज कल इस प्रकार के प्रेम ने अपना जाल पूरी दुनिया पर फैला रखा है। जिसे देखो उसे प्रेम हो गया है। "आई ऍम इन लव" "आई लव यू" जैसे प्रसंग बहुत ही आम हो गए हैं।

परन्तु प्रेमी लोगो बहुत सारे दुखों का सामना करना पड़ता है। उदाहरण के तौर पर : किसी को इस बात का दुःख है कि उनके पास प्रेम करने को बस एक ही प्रेमी है तो कुछ लोग इस बात से चिंतित हैं कि उनका प्रेमी एक से अधिक लोगों से प्रेम करता है। कुछ लोग इस बात से दुखी हैं कि उनका प्रेमी उनको उतना नहीं चाहता जितना वो अपने प्रेमी को चाहते हैं और कुछ इस बात से नाराज हैं कि उनका प्रेमी बेवजह ही उनको इतना प्रेम करता ही। कोई इस बात से परेशान है की उसका प्रेमी उसे छोड़ कर जाता क्यों नहीं तो कुछ इस बात से दुखी हैं की उनका प्रेमी उन्हें छोड़ कर चला गया। किसी न किसी वजह से अधिकांश प्रेमी दुखी ही हैं।

ऐसे प्रेमी लोगों को देख कर बचपन में पढी गई सूरदास कि ये पंक्तियाँ याद आती हैं:

उद्धो मन न भये दस बीस
एक हुतो गयो श्याम संघ को अवराधे ईश
आसा लागि रही तन स्वांसा, जीवहि कोटि बरीस

श्री कृष्ण के मथुरा चले जाने पर जब उद्धो गोपिकाओं को इश्वर में मन लगाने के लिए समझाने आते हैं तो गोपिकाएं उद्धो जी से कहती हैं कि: हे उद्धो! हमारे पास दस या बीस मन नहीं है। हमारे पास तो बस एक ही मन था जो श्री कृष्ण के साथ ही चला गया है, अब किस मन से इश्वर कि आराधना करें। ये जो शरीर में साँस चल रही है बस ये ही जीना कि एक आशा है जिसके सहारे करोणों वर्षों तक जी सकते हैं अन्यथा श्री कृष्ण के पश्चात् जीवित रहना सम्भव नहीं था।

श्री कृष्ण के चले जाने के पश्चात् भी श्री कृष्ण के प्रति गोपिकाओं के प्रेम में किसी प्रकार की कमी नहीं आती है। सच्चे प्रेम के ऐसे उदाहरण आज की दुनिया में मिलना अति दुर्लभ होता जा रहा है।
मुझे लगता था कि, प्रेम, दुनिया का सबसे सुंदर एहसास है परन्तु प्रेम के प्रति मेरा विचार बदलता जा रहा है। आज कल प्रेम का अर्थ केवल कुछ पल तक मन बहलाना हो कर रह गया है। अगर आज के युग में प्रेम ऐसे ही चलता रहा तो, शायद एक दिन प्रेम भी ये भूल जाएगा की प्रेम वास्तव में होता क्या है।

Saturday, December 8, 2007

उपलब्धियाँ

काम के बोझ से दबे होने के बाद आज लंबे अंतराल के बाद आज पुनः कुछ लिखने का प्रयत्न कर रह हूँ।

वर्ष २००७ अपने चरम सीमा पर है और वर्ष २००८ टकटकी बांधे हुए आने की प्रतीक्षा कर रह है। बैठे बैठे मन उन उपलब्धियों की तरफ गया जो वर्ष २००७ में अर्जित की गयी। वैसे तो वर्ष २००७ बहुत से अच्छे बुरे मिले जुले असर छोड़ कर जा रह है परन्तु मैं यहाँ केवल उन उपलब्धियों का जिक्र कर रह हूँ जो पहली बार हुए हैं।

१) भारत ने सर्वप्रथम २०-२० क्रिकेट विश्व कप जीता। आज तक के क्रिकेट के इतिहास में भारत ने कोई भी सबसे पहला विश्व कप नहीं जीता था।
२) सेंसेक्स २०,०० का जादुई आंकडा पार कर गया। विशेषज्ञों का मानना था की ये आंकडा २०१० तक प्राप्त होगा परन्तु ये सभी के अनुमानों के विपरीत ३ वर्ष पूर्व ही हो गया।
३) अमेरिकी डॉलर ३९ भारतीय रुपये के नीचे पहुंच गया जो की आज तक के इतिहास में अमेरिकी डॉलर की रुपये के मुकाबले न्यूनतम मूल्य है।
४) प्रतिभा पाटिल के रूप में २००७ में भारत को अपना पहला महिला राष्ट्रपति मिला। भारतीय राजनीति के इतिहास में होने वाली यह पहली घटना है।

Wednesday, July 25, 2007

मेरा अंतःकरण

सहसा मन की अभिलाषाओं को बल मिलता दिखाई देता है,
दूर दीवार के पीछे से कोई झांकता दिखाई देता है।

मुझे लगा मेरी मंजिल, मेरा सौभाग्य झाँक रह है,
पर पूछने पे पता लगा मेरा अंतःकरण मुझे ताक रह है।

समझने की बात है, जिन मंजिलों का मैं इंतज़ार करता रहा,
वो मेरे अन्दर ही थी पर अब तक मैं उन को पहचान ना सका।

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